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मृगनाभ्यादि वटी (Mrignabhyadi Vati )

एक श्रेष्ठ वाजीकारक योग मृगनाभ्यादि वटी

शीतकाल में शरीर को पोषण और शक्ति प्रदान करने के लिए सेवन योग्य एक उत्तम वाजीकारक योग मृगनाभ्यादि वटी के बारे में विवरण प्रस्तुर किया जा रहा है. विवाहित स्त्री-पुरुषों को इस योग का सेवन कर लाभ उठाना चाहिए. यह नुस्खा बहुत महंगा है अतः धन संपन्न व्यक्ति ही इसका सेवन कर सकते हैं.

मृगनाभ्यादि वटी के घटक द्रव्य (ingredients of mrignabhyaadi vati ) - कस्तूरी २ ग्राम, केसर ४ ग्राम, छोटी इलायची के दाने ५ ग्राम, जायफल ६ ग्राम, बंसलोचन ७ ग्राम, जावित्री ८ ग्राम, सोने के वर्क १ ग्राम और चांदी के वर्क ३ ग्राम, मुक्ता पिष्टी ४ ग्राम - कुल वज़न ४० ग्राम.

मृगनाभ्यादि वटी निर्माण विधि ( preparation method of mrignaabhyadi vati ) - कस्तूरी, केसर, सोने चांदी के वर्क और मुक्ता पिष्टी अलग रख कर शेष सब द्रव्यों को खूब कूट पीस कर महीन चूर्ण कर लें और कस्तूरी केसर आदि द्रव्यों को अलग खरल में घोंट कर यह चूर्ण डाल कर नागर पान का रस छिड़कते हुए घुटाई करें. यह घुटाई ३६ घंटे होनी चाहिए कितने भी दिन में हो. घुटाई करके रत्ती रत्ती भर की ३२० गोली बना लें व् छाया में सुखाकर शीशी में भर लें.

मृगनाभ्यादि वटी मात्रा और सेवन विधि (mrignabhyaadi vati quantity and dosage ) - एक या दो गोली सुबह शाम , एक गिलास मीठे दूध या थोड़ी मलाई के साथ सेवन करें.

मृगनाभ्यादि वटी के लाभ (advantages and health benefits of mrignabhyadi vati ) - मृगनाभ्यादि वटी का उपयोग सामान्य स्वस्थ व्यक्ति भी कर सकता है और यौन दौर्बल्य, मानसिक एवं शारीरिक दौर्बल्य तथा शारीरिक निर्बलता से ग्रस्त व्यक्ति भी कर सकता है. यह योग स्त्री-पुरुषों के लिए सामान रूप से उपयोगी है. पर यौनशक्ति और सामर्थ्य के मामले में पुरुषों के लिए विशेष रूप से, सिर्फ उपयोगी ही नहीं बल्कि आयुर्वेद का एक वरदान ही है. यौन विकारों को नष्ट करने के लिए यह योग अति उत्तम है. वीर्यस्राव, स्वप्नदोष, धातुक्षीणता , शीघ्रपतन, ध्वजभंग (नपुंसकता ) जैसे दोष दूर कर यौनशक्ति बढ़ाने के अलावा प्रमेह, क्षय, श्वास रोग तथा मंदाग्नि दूर कर शारीरिक बल, बुद्धिबल , स्मरणशक्ति और वीर्य की वृद्धि करने वाला यह योग शरीर को निरोग रखता है और और आयु की वृद्धि करता है.

मृगनाभ्यादि वटी रक्तवाहिनी और वातवाहिनी दोनों नाड़ियों पर प्रभाव कर लाभ पहुंचती है. इस वटी में शीतवीर्य द्रव्यों की प्रधानता होने से उष्ण प्रकृति के स्त्री-पुरुष ग्रीष्म ऋतू में भी ीा योग का सेवन निर्भयतापूर्वक कर सकते हैं.

 

 

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