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All About Ayurveda, Ayurveda Herbs and Indian Ayurveda Home Remedies

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ayurveda home remedies and some homeopathic medicines for Low Sperm count and Azoospermia/ Oligospermia

 

A male cannot make a female sex partner pregnant if the quantity of sperms is not sufficient in his semen. An Ayurvedic Indian home remedy for low sperm count is listed below.

1) Vidaryadi Churna

Vidaryadi Churna ingredients: Vidarikand, Safed Musli , Saalampanja, Bade Gokhru and Akarkara- all 100-100 grams each and Misri 300 grams.

Vidaryadi Churna preparation method: mix and grind thin all the ingredients separetly and prepare their powders. Then mix all the powders and sieve them 2-3 times. Your “Vidaryadi churna” is ready. Keep this powder in a jar with air tight cap.

Vidaryadi Churna dosage: take 1 spoonful of Vidaryadi churna every morning and evening with milk.

Vidaryadi Churna benefits: This remedy cures the problem of men who are suffering from low sperm count. Vidaryadi Churna is a tested Indian Ayurveda home remedy for the treatment and cure of low sperm count. It increases the quality and quantity of sperms in seminal fluid of men.

Low sperm count is also known as Oligospermia. Total absence of sperm is called Azoospermia. Biovatica.Com recently met a homeopathy medical practitioner who has successfully treated many sexual health diseases of men including absence of sperms in semen (Azoospermia) and low quantity of sperms in semen (Oligospermia or low sperm count). This doctor has told us earlier that he has recently started efforts for the procreation and increasing quantity of sperms in the seminal fluid. At that time he had a single case, in which, after the treatment of only three months, he was able to produce over 12 lakhs sperms in the patients seminal fluid, even wnen the patient's semen totally lacked the presence of sperms in his semen. This doctor even showed us all the papers/documents related to that case. After seeing that, we had to believe that medical science has evolved enough to prouce sperms even in the patients suffering from azoospermia.

1) Turnera (Damiana)

2) Conium 200
Conium 200

10-12 pills of Conium 200 is to be taken only once in a week . Select any one day of the week and take the dose once a week on that particular day. Do not take any other medicine on this day. This medicine treats erectile dysfunction as well.

In later discussions, this homeopathic doctor told Biovatica.Com that so far, in these types of cases, currently there is no situation of 100% success with these patients. Still, this much success has been achieved that sperm count is increased in more than of the half patients suffering from low sperm count and some quantity of sperms is produced in most of the patients suffering from no sperm count.

Though we have listed the primary homeopathic medicines for low sperm count and no sperm count, still, after studying the different cases of different people, some additional medicines might be needed to achieve the maximum results; such as, C.M. (Onosmodium) and Sepia for the wife of the patient which helps in pregnancy. For men, Iodum and Yohimbinum medicines are given in combination to get the maximum benefit in the treatment of low or no sperm count.

आयुर्वेद और शुक्राणु (shukranu , sperm )

आयुर्वेद की चरक संहिता के अनुसार हम जो भी आहार लेते हैं उसका उत्तम और अंतिम सार है शुक्राणु (shukranu ).अतः हमें इस उत्तम धातु, शुक्राणु धातु की रक्षा करना चाहिए. क्योंकि इस शुक्राणु धातु के क्षीण होने से कई प्रकार के यौन रोग होते हैं और मरणांतक पीड़ा भी होती है. आयुर्वेद कहता है, शरीर की सात धातुओं में सातवी धातु शुक्राणु है - रास, रक्त, मांस, मेद, अस्थि, मज्जा और शुक्राणु. ये सातों धातुएं क्रमशः पुष्ट होती हैं और अंत में हमारा आहार सातवीं धातु शुक्राणु के रूप में पहुँच कर पुष्ट होता है. सातों धातुओं के पुष्ट और परिपूर्ण होने पर ही शरीर पुष्ट और सबल होता है.

आयुर्वेद कहता है शुक्राणु (shukranu ) का व्यय संयम के साथ करना चाहिए . शुक्राणु का अधिक त्याग और शिश्नमुंड का आवरण करना या रगड़ना, खड़े खड़े या चित्त लेट कर शुक्राणु त्याग करना विशेष निंदनीय है. बुद्धिमान और अपना हित चाहने वाले व्यक्ति को खेल में भी शुक्राणु त्याग नहीं करना चाहिए. अर्थात आयुर्वेद ने शुक्राणु को त्यागने में संयम से काम लेने का निर्देश देते हुए शिश्न को रगड़ने, हस्तमैथुन, इस पर आवरण चढाने , खड़े और पीठ के बल लेटकर वीर्यपात करने को त्याज्यकर्म बताया है और खेल खेल में वीर्यपात करना भी वर्जित किया है. आयुर्वेद का तात्पर्य यही है की शुक्राणु का व्यय सोच-समझकर प्राकृतिक ढंग से ही करना चाहिए.

आयुर्वेद के अनुसार शुक्राणु (shukranu ) का स्वरुप इस प्रकार है - शुक्राणु सौम्य , श्वेत वर्ण, स्निग्ध,बल और पुष्टि करने वाला, गर्भ का बीज (वीर्य), शरीर का सार-पदार्थ और जीवात्मा का उत्तम आश्रय है. आयुर्वेद ने शुक्राणु धातु (shukranu ) को पूरे शरीर का सार पदार्थ और जीवात्मा का उत्तम आश्रय यानी श्रेष्ठ आधार कहा है. इसी से शुक्राणु (shukranu ) की महत्ता, उपयोगिता और गुणवत्ता प्रकट हो जाती है. इसीलिए सभी आयुर्वेदिक ग्रंथों ने शुक्राणु की रक्षा करने, इसका सदुपयोग करने और व्यर्थ नष्ट न करने का निर्देश दिया है.

यह तो चर्चा हुई आयुर्वेद शास्त्र के अनुसार, अब एक झलक पश्चिमी आधुनिक चिकित्सा विज्ञान के विचारों की भी प्रस्तुत करते हैं. शुक्र की परिभाषा करते हुए प्रसिद्ध ग्रन्थ 'Principals of Anatomy & Phisiology ' में लिखा है -

Semen (seminal fluid) is a mixture of sperm and secretions of the seminal vesicles, the prostate gland and the bulbourethral gland.

अर्थात शुक्राणु तथा शुक्राशय ग्रंथि , पौरुष ग्रंथि तथा मूत्रप्रसेकीय ग्रंथियों से होने वाले स्त्राव का मिश्रण 'शुक्राणु' है.

Master & Johnson द्वारा लिखे गए ग्रन्थ 'Sex and Human Loving ' में इस मिश्रण की प्रक्रिया का विवरण जरा स्पष्ट रूप से दिया गया है सो भी प्रस्तुत है -

'The prastate produces clear fluid that makes up about 30% of seminal fluid, the liquid that expelled from the penis during ejaculation. the other 70% of seminal fluid comes from the seminal vesicles. these two small structures lie against the back portion of the base of the bladder and join with the ends of the vas diferens to form the ejaculatory ducts. These ducts in turn join the urethra, thereby creating a continuous tubing system that leads to the end of the penis.

अर्थात शुक्रल द्रव (सेमिनल फ्लूइड) का लगभग ३०% भाग पौरुष ग्रंथि (प्रोस्टेट ग्लैंड) से निकलने वाले स्वच्छ स्त्राव से, और ७०% भाग शुक्राशय ग्रंथि से, निकलने वाला होता है जो 'शुक्रलद्रव ' बनता है. यही द्रव स्खलन (एजाकुलेशन) के समय शिश्न से बाहर निकलता है. ये दोनों ग्रंथिया , मूत्राशय (ब्लैडर) के नीचे वाले अंग के ठीक पीछे स्थित होती हैं जो 'शुक्रवाहिनी नलिका' (vas deferens ) से जुड़ कर 'शुक्र स्खलन नलिका' (एजक्यूलरी डक्ट) का निर्माण करती है. बाद में नलिकाएं मूत्रमार्ग (urthra ) से जुड़ कर नलिका का सिलसिला निरंतर जारी रखते हुए शिश्न के अग्रभाग (मूत्रद्वार) पर जाकर समाप्त होती है.

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